शुक्रिया

 तेरी हमदर्दी में वो बात है

मेरे दर्द-ए-दिल को आराम है
जो दुनिया ने समझा नहीं
जो किसी ने माना नहीं

वो टुकड़े जो दिखते न थे
पर मेरी रूह में चुभते तो थे
तूने प्यार से सहला कर, मेरे दिल को कुछ बहला कर
उन टुकड़ों को निकाल कर, फिर आग में थोड़ा तपाकर

टूटी शख़्सियत को जोड़ दिया
अहसान कैसा कर दिया
दिल-रूह से है शुक्रिया
मेरे दोस्त, मेरे रहबर

तेरा शुक्रिया, तेरा शुक्रिया

क्या मज़ा आया?


 

मैंने चाहा तुझे सिखा दूँ

तुझे बता दूँ

तुझे एक सभ्य इंसान बना लूँ


पर मन, तू तो बच्चा था

बच्चा ही रहा

तूने पाया बहुत कुछ

तूने खोया बहुत कुछ


पाकर तू हँस भी लिया

खोकर तू रो भी लिया

पर अंत में फिर वही बोला

क्या इसमें मुझे मज़ा आया?


तूने नकारा नहीं जो तूने पाया

मेहनत करके जो बनाया

तू भागा नहीं जब बोझ बढ़ा

पर रोज़ रात को धीरे से दिल में पूछा

क्या मज़ा आया?


तुझे ले गए हम स्कूल पढ़ने

तुझे ले गए ऑफिस कमाने

तुझे ले गए दुनिया के करतब करने

सब करते हुए तू फिर बोला

क्या मज़ा आया?


पाकर सब भी नकारा तूने

बोला — ये काफ़ी नहीं

ना रुपया-पैसा, ना नाम,

ना सेवा, ना मंदिर,

ना पूजा, ना नमाज़,

ना ध्यान, योग

ये सब तो हैं अंत में बस काम


कुछ खाली हुआ चलते हुए

जो भर रहे हो तुम इनसे

पर अंत में मुझे ये बता

क्या तुझे पता चला कि मज़ा क्या था?


क्या तूने जाना मज़ा किससे है

मैं मन हूँ, बच्चा हूँ

इसलिए सब नामों से, बोधों से ख़रा हूँ

अंत में जीवन के 


बस यहीं रुकेंगे —

“क्या सचमुच मज़ा आया?”